सुविचार
रसिक संतों के छंद दोहे, जो रसोपासना का मानो आधार है और वृंदावन का रस प्राप्त करने का साधन है । रसिक संतों के काव्यों में इनको साखी का नाम भी दिया गया है ।
3521 छंद उपलब्ध हैं
कहा बुद्धि कहा कहि सकूँ - श्री चरणदास
श्रीराधा-कृष्ण की दिव्य रास-केलि की मनोहर प्रेममयी क्रीड़ा का वर्णन करने में मेरी बुद्धि कहाँ समर्थ है? वहाँ ऐसी अद्भुत और अनुपम लीलाएँ हो रही हैं कि उनका वर्णन करने में अपनी असमर्थता का अनुभव कर मुझे लज्जा आती है।
यह उत्कंठा की लता चली - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (15)
मेरे हृदय में उत्पन्न हुई तीव्र उत्कंठा रूपी लता बड़ी शीघ्रता से मुरझाने लगी है। यदि आप दोनों घन-दामिनी स्वरूप श्रीप्रियाप्रियतम (श्रीराधा-कृष्ण) अति शीघ्र पधारकर इस पर अपनी कृपा-जल की वर्षा नहीं करेंगे, तो यह लता विरह की अग्नि में सूखकर नष्ट हो जाएगी।
कबकी टेरत दीन है सुनत न नाथ पुकार - श्री दयाबाई
हे नाथ! यह दीन जीव न जाने कब से आपको पुकार रहा है, किंतु आप मेरी पुकार सुन ही नहीं रहे हैं। क्या आपके कान ऊँचा सुनने लगे हैं, अथवा आपने दीनों पर दया करने का अपना सहज स्वभाव (विरद) ही भुला दिया है?
राधे आनन निरखिकै चकित रहे - श्री ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज शृंगार (32)
श्री राधा के श्रीमुख को निहारकर स्वयं नंदनंदन श्री कृष्ण आश्चर्य चकित रह जाते हैं। प्रेम की रीति बड़ी विचित्र है कि त्रिभुवन-मोहन, ब्रजचन्द्र श्री कृष्ण भी चकोर की भाँति श्री राधा के मुख-चंद्र को टकटकी लगाए निहार रहे हैं।
सुजस जाहु व्यौहार लागि परमारथ - श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (8)
भले ही संसार के लोक-व्यवहार में मेरा यश और सुकीर्ति नष्ट हो जाए तथा परमार्थ के क्षेत्र में भी मेरा नाम पूर्ण रूप से मिट जाए, फिर भी मैं श्री धाम वृन्दावन को छोड़कर किसी भी अन्य स्थान पर कभी नहीं जाऊँगा।
नाम सुन्यौ हो गाँव बसि - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (442)
जैसे किसी गाँव में एक ही नाम के अनेक व्यक्ति रहते हों, तो बिना परिचय और पहचान के केवल नाम जानकर किसी विशेष व्यक्ति को खोजना असंभव है। खोजते-खोजते मनुष्य अंततः थककर निराश हो जाता है। इसी प्रकार केवल भगवान् के नाम का जप पर्याप्त नहीं है। जब तक उनके किसी विशेष स्वरूप से प्रेमपूर्ण भाव-संबंध स्थापित न हो, तब तक उनकी वास्तविक प्राप्ति नहीं हो सकती।
तत्समो नास्ति तीर्थोऽन्यो न च - सनत्कुमार संहिता (32.1)
हे मुनि! ब्रज-वृंदावन के समान कोई दूसरा तीर्थ नहीं है। यहाँ तक कि वैकुण्ठ भी उसकी समानता नहीं कर सकता, फिर अन्य तीर्थों की तो बात ही क्या! इस धाम की तुलना में वे सभी अंधे कुओं के समान हैं।
शोभा युगल किशोरकी को कवि - ब्रज के दोहे
श्री युगल किशोर (राधा-कृष्ण) की अलौकिक शोभा का वर्णन कौन कवि कर सकता है? वे दोनों मन को मोहने वाले शीतल चंद्रमा के समान पवित्र हैं और समस्त गोपियों के जीवन के एकमात्र धन और प्राण हैं।
निरगुन अविनासी मत कहा आनि - श्री सूरदास, सूर सागर (4215.5)
अरे उद्धव! हम ब्रजांगनाएँ तो प्रेममार्ग की उपासिकाएँ हैं और तुम ब्रज में आकर हमें ही अविनाशी निर्गुण ब्रह्म का ज्ञान सुनाना चाहते हो, जो हमें कदापि स्वीकार नहीं है। अतः तुम पहले यह बताओ कि सूरदास जी के स्वामी और हमारे जीवन-धन श्रीकृष्ण को कहाँ छोड़ आए हो? अच्छा तो यही होगा कि तुम उन्हें यहाँ हमारे पास ले आओ।
श्रीमद् वृन्दावनभुवि - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (6.35)
जिस व्यक्ति ने परमानंद साम्राज्य के मूलस्वरूप श्रीधाम वृंदावन की पावन भूमि में जीवन के अंतिम क्षण तक निवास करने का दृढ़ संकल्प कर लिया है, उसे मैं सादर प्रणाम करता हूँ। क्योंकि श्रीराधारानी और रसिकशिरोमणि श्रीकृष्ण ऐसे व्यक्ति को अपने निजजनों में सम्मिलित होने के योग्य समझकर, परस्पर प्रेमपूर्वक विचार करते हैं कि “हमें इसकी किस प्रकार देखभाल करनी चाहिए और इसके लिए क्या व्यवस्था करनी चाहिए?”
लता कुंज वृंदा बिपिन बिहरें - श्री सरस माधुरी
श्रीवृंदावन के लता-कुंजों में दोनों परम सुकुमार श्रीराधा-कृष्ण नित्य विहार कर रहे हैं। उनके श्रीमुख की मकरंद-रूपी माधुरी को प्राप्त करके भँवरे आनंदित होकर मधुर गुंजार कर रहे हैं (अथवा रसिक जन उनका सुंदर गुणगान कर रहे हैं)।
अँग-सँगनि सँग लै सखी लेउ - श्री हरिव्यस देवाचार्य, महावाणी, सुरत सुख (122)
हे सखियों! अपनी समस्त अंग-संगिनी सहचरियों को साथ लेकर आज श्रीप्रियाप्रियतम के प्रेम-विलास के संपूर्ण रस का भरपूर आनंद लूट लो। आज विजयादशमी की रात्रि है, अतः श्रीराधा-कृष्ण की यह दिव्य युगल जोड़ी अपने परस्पर प्रेमानंद से करोड़ों कामदेवों को परास्त कर पूर्ण विजय प्राप्त करे।
यह रस अनुभव जनित है - चाचा श्री वृंदावन दास जी
यह रस प्रत्यक्ष अनुभव से ही प्राप्त होता है, जिसके लिए मन में प्रगाढ़ प्रेम होना आवश्यक है। श्रीहित हरिवंश महाप्रभु की कृपा से इस रस की प्राप्ति सहज और सुलभ रीति से हो जाती है।
कुंजबिहारिनि स्वामिनी अपनी निजु - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (182)
कुंजबिहारिणी श्रीराधा महारानी जू ही मेरी एक मात्र स्वामिनी हैं, जिन्होंने मुझे पूर्णतः अपना निज जन बना लिया है। उन्होंने अपने अत्यंत अद्भुत रूप का दर्शन कराकर मुझे अपने परम प्रेम-रस में पूर्ण रूप से सराबोर कर दिया है।
परम धन्य ब्रजलोक यह धनि - ब्रज के दोहे
यह ब्रजभूमि अत्यंत धन्य है और यहाँ का बरसाना गाँव भी परम धन्य है। वह गोप-कुल भी परम धन्य है, जिसका धाम नित्य मंगलमय और रस बरसाने वाला है।
द्वै जवाहिर नैन में एक हीरा एक लाल - श्री मलूक दास जी की वाणी, श्रीराधाकृष्ण व्याहुला (3)
श्रीराधा और श्रीकृष्ण रूपी दो अनमोल रत्न भक्तों के नेत्रों में बसे हुए हैं। इनमें से एक हीरे के समान उज्ज्वल है और दूसरा लाल मणि के समान अनुपम है। सच्चे जौहरी के समान रसिक भक्त ही इन दोनों दिव्य रत्नों के सौन्दर्य और प्रेममयी महिमा को पहचानकर उनका आस्वादन करते हैं।
उद्धवागमने जात उत्सवः सुमहान् - श्री वल्लभाचार्य, निरोधलक्षणम (3)
जिस प्रकार श्रीउद्धवजी के आगमन पर श्रीवृन्दावन अथवा गोकुल में महान उत्सव और आनंद प्रकट हुआ था, उसी प्रकार का दिव्य हर्ष और उत्सव मेरे हृदय में भी क्या कभी प्रकट होगा?
वृन्दावन ही बीज है वृन्दावन - श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (86)
श्रीवृन्दावन ही विशुद्ध प्रेमाभक्ति का बीज है और श्रीवृन्दावन ही उसका खिला हुआ पुष्प है। श्रीवृन्दावन ही समस्त मनोरथों को पूर्ण करने वाला कल्पवृक्ष है तथा श्रीवृन्दावन ही प्रेम-रस का मूल स्रोत और आधार है।
रसिक रसीली रसभरी रसरूपा रस - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, श्री राधा नाम अंक (02)
समस्त रसिकों को परम रस प्रदान करने वाली श्रीराधारानी स्वयं रसस्वरूपिणी और दिव्य प्रेम-रस की सारस्वरूपा हैं। वे ही समस्त रसिकों की एकमात्र जीवन-प्राण तथा समस्त सखियों की परम स्वामिनी हैं।
स्वामी श्री हरिदास जू बीठल - श्री किशोरी अलि (रत्न अलि को पत्र-व्यवहार)
स्वामी श्री हरिदास जी, श्री विट्ठल विपुल जी, श्री विनोद जी, दासी श्री बिहारिनिदास जी तथा श्री व्यास जी की पावन रज प्राप्त करके परम आनंद पाया है। इन महान रसिक आचार्यों के चरणों की रज का आश्रय ही समस्त दिव्य सुख और उल्लास को प्रदान करने वाला है।