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  1. झूठ मसकरी मन लगै हरि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (114)

    सांसारिक जीव का मन व्यर्थ की बातों और हँसी-मज़ाक में तो सहज ही लग जाता है, किन्तु श्रीहरि के भजन के समय वह टालमटोल करने लगता है। श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि ऐसे जीव की भजन-विमुखता देखकर भक्ति स्वयं पुकारती हुई उनकी देहली से ही लौट जाती है।

  2. साँवरे देखे बिन परत न - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, श्री लालजी की उत्थापन लीला (13)

    हे सखी! साँवरे (श्रीकृष्ण) के दर्शन किए बिना मुझे तनिक भी चैन नहीं पड़ता। प्रत्येक क्षण मेरा मन व्याकुल रहता है, क्योंकि मेरे नेत्र उनके अनुपम रूप के दर्शन के लिए निरन्तर प्यासे हैं।

  3. जायौ भौंड़ी भेड़ कौ कीनौं - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (576)

    यदि कोई भेड़ का बच्चा (भोली भेड़) सिंह बनना चाहे, तो केवल इच्छा करने से वह सिंह नहीं बन सकता। सिंह तो वही बन सकता है जिसने अपने चारों ओर की सभी बाड़ें (बंधन और सीमाएँ) तोड़ दी हों। जो अनेक धर्मों-कर्मों, विधि-निषेधों, सांप्रदायिक विकृतियों अथवा बन्धनों में फँसा हुआ हो, वह सिंह के समान दृढ़ व्रत रखने वाले अनन्य रसिकों की भला क्या समानता करेगा। वास्तविक रसिक तो वही होता है जिसने समस्त बन्धनों को तोड़कर केवल एकमात्र प्रिया-प्रियतम से ही अनन्य सम्बन्ध जोड़ लिया हो।

  4. रसना! श्रीराधाबल्लभ कहि री - श्री हित कमलनैन, श्री हित कमलनैन जी की वाणी, अष्टायामी पदावली (205)

    हे रसना! निरन्तर "श्रीराधाबल्लभ" नाम का ही उच्चारण कर। श्रुति, स्मृति और पुराणों के विविध विषयों में अधिक न उलझकर, इस नाम-रस को दृढ़तापूर्वक ग्रहण कर।

  5. ध्याने ध्यानेन राधाया व्यायन्ते - ब्रह्मवैवर्तपुराण - 4.124.97 (खण्डः 4 [श्रीकृष्णजन्मखण्डः]/अध्यायः 124 / छंद 97)

    जो साधक निरन्तर श्रीराधा के ध्यान में तल्लीन रहते हैं और अपने मन को उन्हीं के ध्यान में लगाते हैं, वे इसी जीवन में जीवन्मुक्त हो जाते हैं। शरीर त्यागने के पश्चात् वे श्रीकृष्ण के पार्षद (नित्य दिव्य सेवक) बनते हैं।

  6. नीके द्रुम फूले-फूल सुभग - श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (29)

    परम पावन श्री यमुनाजी के पुलिन पर समस्त तरु-लताओं में अलौकिक पुष्प विकसित हो रहे हैं। आकाश में सघन श्याम-घटाओं के मध्य सतरंगी इंद्रधनुष की अनुपम छटा सुशोभित हो रही है।

  7. हरि कौ सुमिरौ हर घरी - श्री रसनिधि

    हे परम चतुर और सज्जन पुरुषों! जीवन की प्रत्येक घड़ी में श्री हरि का ही स्मरण करो और अपनी जिह्वा से सदैव 'हरि हरि' बोलो। प्रत्येक प्रकार से श्री हरि के ही बनकर रखो। इसी में ही जीवन की परम सार्थकता है।

  8. लीने लली ललतादिक संग उमंग - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (61)

    श्री वृषभानु-दुलारी श्रीराधा अपनी ललिता आदि सखियों के संग अत्यंत उमंग के साथ सुंदर फुलवारी में पधारी हैं जहाँ मालती, कुंद, निवारी तथा गुलाब आदि विविध पुष्पों से सुसज्जित फुलवारी चारों ओर अपनी सुगंध बिखेर रही है।

  9. कब रसिकनिके पैर परि रोऊँ - श्रीप्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी, श्रीवृन्दावन माहात्म्य (04)

    वह समय कब आएगा जब मैं अत्यन्त दीन होकर रसिक महापुरुषों के चरणों में गिरकर विलाप करूँगा? और वह अवस्था कब प्राप्त होगी जब अपने प्रियतम के दर्शन के बिना मैं जल के बिना तड़पती हुई मछली के समान व्याकुल हो जाऊँगा?

  10. प्रभु मैं पीछौ लियौ तुम्हारौ - श्री सूरदास, सूरसागर (218)

    हे प्रभु! मैंने अब आपका पीछा पकड़ लिया है, अर्थात् अब मैं आपकी अनन्य शरण में आ गया हूँ। आप तो दीनों पर दया करने वाले कहे जाते हैं, अतः मेरी समस्त विपत्तियों को टाल दीजिए।

  11. देह धरेका फल यही भज मन कृष्ण मुरार - श्री कबीरदास

    हे मन! इस मानव देह को धारण करने का वास्तविक फल केवल यही है कि तू निरंतर श्रीकृष्ण मुरारि का भजन कर। मनुष्य-जन्म का वास्तविक आनंद भगवद्भजन में ही है, क्योंकि यह दुर्लभ अवसर बार-बार प्राप्त नहीं होता।

  12. मेरी कुल पूजि तुहीं मानी - श्री मनोहर दास, रसिक जीवनी (41)

    हे स्वामिनी! मैंने तुम्हें ही अपने कुल की पूज्या और अपनी एकमात्र ठकुरानी (स्वामिनी) माना है। मैं तुम्हें ही नित्य अपनी आँखों में और अपने हृदय में धारण करती हूँ।

  13. बार बार नन्दनंद इत आतुर - श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास

    श्रीकृष्ण अत्यन्त व्याकुल होकर बार-बार उसी मार्ग की ओर निहार रहे हैं, जहाँ श्री राधा के चरण पड़े हैं। उनके चकोर-रूपी नेत्र अपनी प्रियतमा श्रीराधा के मुखचन्द्र के दर्शन के लिए परम लालायित हैं।

  14. बास बरसाने को मोहि दीजे - श्री सरस माधुरी

    हे किशोरी जी! मुझे अपने परम पावन धाम बरसाने का वास प्रदान कीजिए। हे कीर्ति मैया के कुल को सुशोभित करने वाली नवल कुँवरि श्री राधा! मेरी इस प्रार्थना को सुनिए और दया करके मुझे अपनी निज दासी बना लीजिए।

  15. भ्रंसिन्या - श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (49)

    अरे मन! श्री कृष्ण के चरण कमलों के प्रेमधन को नष्ट कर देने वाली स्त्रियों के परिहासमय स्नेह वचनों में फँस कर प्रेमधन से वञ्चित मत हो। पुत्र-मित्र-वैभवों को नश्वर जान कर उनकी आकांक्षा मत करो। निरन्तर राधादास्य प्रदानकारी वृषभानुनन्दिनी सरसी अर्थात् श्री राधाकुण्ड का ध्यान करो।

  16. सखी सुनु बरषैगो रस-मेह राधाकृष्ण - श्री संकेत अली, संकेत लता, विवाह प्रकर्ण(1)

    हे सखी! सुनो, अब प्रेम-रस की वर्षा होने वाली है। मैं अभी उनके घर से यह बात सुनकर आई हूँ कि हमारे प्यारे श्री राधा-कृष्ण का परस्पर मंगलमय विवाह होने वाला है।

  17. गौरांगी श्रीराधिका प्रीतम की उरहार- श्री रूप माधुरी जी की वाणी, श्री राधा नाम अंक (01)

    गोरे अंगों वाली श्रीराधिका अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के हृदय का हार हैं। वे सबके मन को मोहने वाले (मनमोहन) श्रीकृष्ण के मन को भी मोहने वाली हैं तथा अत्यंत कृपालु और परम उदार हैं।

  18. चन्द्रिका की चटक मुकुट की - श्री रसिक गोविंद

    आज हिंडोले पर झूलते हुए युगल सरकार की रूप-माधुरी का वर्णन करते हुए श्री रसिक गोविंद कहते है – ठाकुर जी के मस्तक पर धारण की हुई चन्द्रिका की उज्ज्वल आभा (चटक), उनके मुकुट का सुंदर ढंग से एक ओर लटकना, और दोनों के चंचल नेत्रों तथा भौंहों की चित्ताकर्षक मटक देखते ही बनती है। झूला झूलते समय उनके हृदय पर सुशोभित पुष्पों की मालाओं का हवा में झटकना परम सुंदर प्रतीत होता है।

  19. प्रात: काल ही ऊठि के - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख (04)

    श्री हरिव्यास देवाचार्य कहते हैं कि इस रसोपासना मार्ग के साधक को चाहिए कि वह प्रातःकाल उठकर सखी का बाह्य वेश धारण न करे, अपितु सखीभाव को अपने अंतःकरण में धारण करे। उस अन्तःचिन्तित सखीभाव के द्वारा वह अपने निज स्वरूप—अर्थात् निकुञ्ज में स्थित अपने नित्य सेवामय (या गुरुप्रदत्त सिद्ध) स्वरूप—से भावपूर्वक एकरूप हो। नित्य सहचरी-स्वरूप की सेवा में प्रविष्ट होने का यही एक उपाय है।

  20. ललिता श्रीहरिदासी के आँगन सुखद - श्री राधाशरण देव

    स्वामी श्रीहरिदास जी (ललिता सखी) के आँगन में अत्यंत सुखदाई बधाई बज रही है, क्योंकि रसिक भक्तों को परमानंद प्रदान करने के लिए निकुंज महल से साक्षात् श्रीबाँकेबिहारी जी प्रकट हो गए हैं।