रूप की हैं गोपिका अनन्त प्रीति गीतिका हैं - ब्रज के कवित्त
श्री राधा साक्षात सौंदर्य की गोपिका तथा अनंत प्रेम की मधुर गीतिका हैं; वे बरसाने की लाड़ली किशोरी और महाराज वृषभानु की सुपुत्री हैं।
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श्री राधा साक्षात सौंदर्य की गोपिका तथा अनंत प्रेम की मधुर गीतिका हैं; वे बरसाने की लाड़ली किशोरी और महाराज वृषभानु की सुपुत्री हैं।
श्री युगल किशोर (राधा-कृष्ण) की अलौकिक शोभा का वर्णन कौन कवि कर सकता है? वे दोनों मन को मोहने वाले शीतल चंद्रमा के समान पवित्र हैं और समस्त गोपियों के जीवन के एकमात्र धन और प्राण हैं।
श्री कृष्ण की आनंद और प्रेम-रस से भरी तिरछी चितवन तथा उनकी अत्यंत सुंदर मुस्कान मन को बहुत सुहावनी लगती है।
अरे उद्धव! हम ब्रजांगनाएँ तो प्रेममार्ग की उपासिकाएँ हैं और तुम ब्रज में आकर हमें ही अविनाशी निर्गुण ब्रह्म का ज्ञान सुनाना चाहते हो, जो हमें कदापि स्वीकार नहीं है। अतः तुम पहले यह बताओ कि सूरदास जी के स्वामी और हमारे जीवन-धन श्रीकृष्ण को कहाँ छोड़ आए हो? अच्छा तो यही होगा कि तुम उन्हें यहाँ हमारे पास ले आओ।
श्री श्यामा-श्याम निकुंज में विराजमान हैं। उनके चारों ओर मालती, माधवी और विविध प्रकार के सुंदर पुष्प खिले हुए हैं, जिससे वह संपूर्ण धाम अत्यंत सुशोभित हो रहा है।
जिस व्यक्ति ने परमानंद साम्राज्य के मूलस्वरूप श्रीधाम वृंदावन की पावन भूमि में जीवन के अंतिम क्षण तक निवास करने का दृढ़ संकल्प कर लिया है, उसे मैं सादर प्रणाम करता हूँ। क्योंकि श्रीराधारानी और रसिकशिरोमणि श्रीकृष्ण ऐसे व्यक्ति को अपने निजजनों में सम्मिलित होने के योग्य समझकर, परस्पर प्रेमपूर्वक विचार करते हैं कि “हमें इसकी किस प्रकार देखभाल करनी चाहिए और इसके लिए क्या व्यवस्था करनी चाहिए?”
जिस जीव पर श्रीराधा-कृष्ण के युगल प्रेम का रंग चढ़ जाता है, वह दंपति सरकार के श्रीअंगों की शोभा निरखते ही एक पल में तीनों लोकों के समस्त सुखों को भूल जाता है।
श्रीवृंदावन के लता-कुंजों में दोनों परम सुकुमार श्रीराधा-कृष्ण नित्य विहार कर रहे हैं। उनके श्रीमुख की मकरंद-रूपी माधुरी को प्राप्त करके भँवरे आनंदित होकर मधुर गुंजार कर रहे हैं (अथवा रसिक जन उनका सुंदर गुणगान कर रहे हैं)।
हे श्रीराधा-माधव! मैंने आपकी शरण का आश्रय लिया है, अब आप मेरी रक्षा कीजिए और मुझ पर कृपा करके मेरा पक्ष रखिए। मुझे श्रीवृन्दावन के दिव्य वनों में निवास प्रदान कीजिए, जहाँ मैं निर्भय होकर विचरण कर सकूँ और अपनी मूढ़ता तथा अज्ञान के बन्धनों को तोड़कर मुक्त हो जाऊँ।
हे सखियों! अपनी समस्त अंग-संगिनी सहचरियों को साथ लेकर आज श्रीप्रियाप्रियतम के प्रेम-विलास के संपूर्ण रस का भरपूर आनंद लूट लो। आज विजयादशमी की रात्रि है, अतः श्रीराधा-कृष्ण की यह दिव्य युगल जोड़ी अपने परस्पर प्रेमानंद से करोड़ों कामदेवों को परास्त कर पूर्ण विजय प्राप्त करे।
रास के अवसर पर श्रीप्रियाजी के अद्भुत रूप-लावण्य के दर्शन कर श्रीलालजी माधुर्य-रस के सागर में डूब जाते हैं।
यह रस प्रत्यक्ष अनुभव से ही प्राप्त होता है, जिसके लिए मन में प्रगाढ़ प्रेम होना आवश्यक है। श्रीहित हरिवंश महाप्रभु की कृपा से इस रस की प्राप्ति सहज और सुलभ रीति से हो जाती है।
श्रीलालजी (श्रीकृष्ण) के हृदय में सदैव यही लालसा बनी रहती है कि कब श्रीप्रियाजी (श्रीराधा) प्रसन्न होकर मेरी ओर तनिक-सा निहारेंगी।
कुंजबिहारिणी श्रीराधा महारानी जू ही मेरी एक मात्र स्वामिनी हैं, जिन्होंने मुझे पूर्णतः अपना निज जन बना लिया है। उन्होंने अपने अत्यंत अद्भुत रूप का दर्शन कराकर मुझे अपने परम प्रेम-रस में पूर्ण रूप से सराबोर कर दिया है।
हे प्रभु! मैं केवल आपका हूँ और आप मेरे हैं। जब मेरे स्वामी मुझसे प्रसन्न हैं, तब यह संसार या कोई आलोचक मेरा क्या कर सकता है, चाहे लोग कितनी भी बातें क्यों न बनाते रहें।
यह ब्रजभूमि अत्यंत धन्य है और यहाँ का बरसाना गाँव भी परम धन्य है। वह गोप-कुल भी परम धन्य है, जिसका धाम नित्य मंगलमय और रस बरसाने वाला है।
चाहे कोई मुझे दुराचारिणी कहे, कुलीन अथवा अकुलीन कहे, दरिद्र, कलंकिनी या कुल की मर्यादा का उल्लंघन करने वाली स्त्री कहे, मुझे इन बातों की तनिक भी परवाह नहीं है।
श्रीराधा और श्रीकृष्ण रूपी दो अनमोल रत्न भक्तों के नेत्रों में बसे हुए हैं। इनमें से एक हीरे के समान उज्ज्वल है और दूसरा लाल मणि के समान अनुपम है। सच्चे जौहरी के समान रसिक भक्त ही इन दोनों दिव्य रत्नों के सौन्दर्य और प्रेममयी महिमा को पहचानकर उनका आस्वादन करते हैं।
सखियाँ अत्यंत प्रसन्नचित्त होकर श्री युगल सरकार के चरणों की सेवा कर रही हैं। वे बड़ी कोमलता से धीरे-धीरे उनके चरणों को दबा रही हैं और श्री युगल की रसमयी बातों का आनंद ले रही हैं।
जिस प्रकार श्रीउद्धवजी के आगमन पर श्रीवृन्दावन अथवा गोकुल में महान उत्सव और आनंद प्रकट हुआ था, उसी प्रकार का दिव्य हर्ष और उत्सव मेरे हृदय में भी क्या कभी प्रकट होगा?