जाके बश में रहत हौं - श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास
अपनी प्रभुता और ऐश्वर्य को त्यागकर मैं जिसके वश में रहता हूँ, उसी अनन्य प्रेम-भक्ति के द्वारा मनुष्य श्री वृन्दावन का परम अनुराग प्राप्त करता है।
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अपनी प्रभुता और ऐश्वर्य को त्यागकर मैं जिसके वश में रहता हूँ, उसी अनन्य प्रेम-भक्ति के द्वारा मनुष्य श्री वृन्दावन का परम अनुराग प्राप्त करता है।
राजा वृषभान के घर में आज परम आनंद का धाम छा गया है, क्योंकि माता कीर्ति के महल में एक ऐसी लाड़ली पुत्री ने जन्म लिया है, जिसके समान अलौकिक और सुंदर कोई दूसरी किशोरी इस संसार में नहीं है।
हे सखी! आज अपने नेत्रों का वास्तविक फल प्राप्त कर लो और अपने धन्य भाग्य की सराहना करो। जो स्वयं अजन्मा हैं, उन श्रीप्रियाजी के इस धरा पर प्राकट्य के परम मंगलकारी बधाई गीतों का गान करो।
आज का दिन अत्यंत शुभ और मंगलमय है क्योंकि आज हमारी प्राणप्यारी श्रीराधा जी ने जन्म लिया है, जिससे हमारे जीवन के सभी काज और मनोरथ सिद्ध हो गए हैं।
हे श्री गुरुदेव और श्री लाडिली-लालजी! आप मेरी इस अभिलाषा को पूर्ण कीजिए कि मेरे चित्त में सदैव आपके युगल चरणों का वास रहे जिससे मेरे हृदय में निरंतर आनंद का संचार होता रहे, और आप मेरी बुद्धि को अपने दिव्य प्रकाश से आलोकित कर दें।
श्री वृषभान जी के राजद्वार पर मंगलमयी बधाई बज रही है। रानी कीर्ति के यहाँ लाडली श्रीराधा जी पुत्री रूप में प्रकट हुई हैं, मानो संसार को समस्त निधियों की प्राप्ति हो गई है, जिसके उत्सव में प्रचुर दान दिया जा रहा है।
जीभ निरंतर प्रेम के परम सुंदर नाम 'राधा-राधा' का ही रटन कर रही है। श्री राधा साक्षात् प्रेम का धाम हैं और वे ही समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली हैं।
श्री राधारानी के चरण अत्यंत सुंदर, हितकारी और भक्तों के मन को प्रिय लगने वाले हैं, जो सभी संकटों का हरण करने वाले तथा ऋद्धि-सिद्धि प्रदान करने वाले हैं।
जो रसिक इस युगल-रस में सदैव रंगे रहते हैं, उनकी चरण-रज सदैव मस्तक पर धारण करनी चाहिये। श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि जिन्होंने इस रहस्य को भली-भांति समझ लिया है, उन्होंने ही अपने इस मानव-शरीर को वास्तव में सफल किया है।
हे श्रीराधा प्यारीजू! ऐसी कृपा कीजिए कि मुझे रसिक संतों का संग प्राप्त हो। उनके पावन संग के प्रभाव से मेरे हृदय में विशुद्ध राधा-किंकरी-भाव जागृत हो और मन निरंतर भगवद-प्रेम के रस में भीगा रहे।
सहज और अजन्मा रूप वाले दोनों श्रेष्ठ रसिक निरंतर परस्पर विहार करते हैं। मैं निरंतर एकरस होकर उसी अनुपम केलि का भजन करता हूँ, जो श्री हरिदासी पद्धति की अत्यंत विलक्षण और अद्वितीय क्रीड़ा है।
आज रंग महल की सहचरी-समाज का यह रस स्वाभाविक रूप से मन को बहुत प्रिय लग रहा है, जहाँ गौर वर्ण वाली अत्यंत भोली सुकुमारी किशोरी श्रीराधा ने श्री कृष्ण को देखकर हर्षित होते हुए उन्हें गले से लगा लिया है।
हे ब्रजनाथ (श्री कृष्ण)! आप मेरे कर्मों का लेखा-जोखा मत देखिए, अर्थात् मेरे दोषों पर ध्यान मत दीजिए। आप तो कृपा करके मेरे हाथ को अपने कर-कमलों से दृढ़तापूर्वक थाम लीजिए। भाव यह है कि मेरे कर्म इतने निकृष्ट हैं कि उनके बल पर मेरा उद्धार कभी संभव नहीं है, परन्तु यदि आप कृपा करके मुझे अपना मान लें और मेरा हाथ थाम लें, तभी मेरा उद्धार संभव है।
यह शरीर एक दिन अवश्य ही नष्ट होकर राख में मिल जाएगा, जिसके बाद इस संसार में तुम्हारा रत्ती भर भी नाम-निशान नहीं रहेगा और सारा जग तुम्हें भूल जाएगा। जब मृत्यु की निर्धारित घड़ी पूरी होगी, तब इस संसार के भ्रम-जाल को छूटने में एक क्षण का भी समय नहीं लगेगा।
श्रीराधा अपने अधखुले नेत्रों से अत्यंत अनुरागपूर्वक तिरछी चितवन से पीछे की ओर निहारती हैं। उनका यह देखना ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई ध्वज आगे की ओर बढ़ रहा हो, और उसकी पताका पीछे की ओर फहरा रही हो।
श्रीवृषभानुकिशोरी श्रीराधा अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के साथ शयन कर रही हैं और अपने प्राणप्रिय नन्दनन्दन के मुखमण्डल की अनुपम छवि को निहारते हुए उनके कण्ठ से लग गई हैं।
कबीरदास जी कहते हैं कि यह मानव शरीर एक दिन अवश्य नष्ट हो जाएगा, इसलिए यदि संभव हो तो समय रहते इससे अपना कल्याण कर लो। अपने कल्याण के लिए या तो संतों की निष्काम सेवा करो या भगवान श्री कृष्ण के गुणों का गान करो।
यदि इस मानव जीवन में अपना कल्याण न कर पाए तो फिर कभी नहीं हो सकेगा, क्योंकि यह मनुष्य शरीर बार-बार नहीं मिलता और न ही माता बार-बार इसे जन्म देगी; यदि यह अवसर चूक गए तो पुनः चौरासी लाख योनियों के चक्र में गिरना पड़ेगा और यमराज के दंड से तुम्हारा संघर्ष होता रहेगा।
जब भी कोई वैष्णव भक्त घर पर पधारें, तब उन्हें चार बहुमूल्य रत्न अवश्य अर्पित करने चाहिए। वे चार रत्न हैं—बैठने के लिए आदरपूर्वक आसन, पीने के लिए शीतल जल, अत्यंत मधुर एवं प्रिय वाणी, और अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्रेमपूर्वक भोजन या अन्न-प्रसाद।
मैं सदा प्रभु के इन नयनों पर न्योछावर होता रहूँ और आपकी इस सुंदर छटा पर निरंतर बलिहारी जाता रहूँ।