सुविचार

रसिक संतों के छंद दोहे, जो रसोपासना का मानो आधार है और वृंदावन का रस प्राप्त करने का साधन है । रसिक संतों के काव्यों में इनको साखी का नाम भी दिया गया है ।

3503 छंद उपलब्ध हैं

  1. रसिक रसीली रसभरी रसरूपा रस - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, श्री राधा नाम अंक (02)

    समस्त रसिकों को परम रस प्रदान करने वाली श्रीराधारानी स्वयं रसस्वरूपिणी और दिव्य प्रेम-रस की सारस्वरूपा हैं। वे ही समस्त रसिकों की एकमात्र जीवन-प्राण तथा समस्त सखियों की परम स्वामिनी हैं।

  2. स्वामी श्री हरिदास जू बीठल - श्री किशोरी अलि (रत्न अलि को पत्र-व्यवहार)

    स्वामी श्री हरिदास जी, श्री विट्ठल विपुल जी, श्री विनोद जी, दासी श्री बिहारिनिदास जी तथा श्री व्यास जी की पावन रज प्राप्त करके परम आनंद पाया है। इन महान रसिक आचार्यों के चरणों की रज का आश्रय ही समस्त दिव्य सुख और उल्लास को प्रदान करने वाला है।

  3. अजापुत्र मैं मैं कहत दिये आपने प्रान - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (100)

    बकरी का बच्चा 'मैं-मैं' (अहंकार) की पुकार करते हुए अपने प्राण गंवा देता है, जबकि उससे कहीं भली मैना है जो प्रभु का नाम लेकर आनंद से मलीदा खाती है। भाव यह है कि 'मैं-मैं' अर्थात् अहंकार जीव का विनाश कर देता है, जबकि प्रभु का नाम सुमिरन करने से ही सच्चा सुख प्राप्त होता है।

  4. वृन्दाविपिन विलास कौ ब्रह्म न पायौ अंत - श्री ब्रजजीवन जी

    श्री वृन्दावन के नित्य विलास का अंत स्वयं परब्रह्म भी नहीं पा सकते, जहाँ के पुष्प और फल दिव्य प्रेम-रस से परिपूर्ण होकर सदा आनंद में झूमते रहते हैं, जिसे देखकर श्री ब्रजजीवन का हृदय सदैव प्रफुल्लित रहता है।

  5. ललित सरोवर ललित वन ललना लाल समेत - श्री ललितमोहिनी देव, विशिष्ट पद एवं साखी (17)

    अति सुंदर सरोवर, अत्यंत मनोहर वन, और प्रियतमा श्रीराधा (ललना) तथा प्रियतम श्रीकृष्ण (लाल) के सहित ये निकुंज और लीला-शैया ही श्री वृंदावन धाम के प्राकट्य का मुख्य प्रयोजन और परम प्रेम का स्वरूप हैं।

  6. देवतायतनानि कम्पन्ते राधाया - अथर्ववेद, श्रीराधिका तापनीयोपनिषत् (03)

    श्री राधिका की कृपा के लवलेश मात्र से देवता आनन्दित हो-होकर हँसते और नृत्य करते हैं और उनकी भृकुटी के नेक ही वक्र होने पर थर-थर काँपते हैं। अतः हम श्रुतियाँ भी सकल दोष-परिहार के लिए भूर्भुवः स्वः आदि व्याहृतियों के साथ स्तवन करती हुई उन्हें सदा अनुकूल करने के लिए वन्दना करती हैं।

  7. कर लकुटी मुरली गहैं घूँघर वारे केश - ब्रज के दोहे

    हाथों में लाठी और मुरली धारण किए हुए तथा सिर पर घुँघराले बालों से सुशोभित, श्यामसुंदर का यह अत्यंत सुंदर और मनमोहक स्वरूप मेरे हृदय में सदैव बसा रहे।

  8. श्रुति पुरान आगम स्‍मृति प्रेम सबहि को सार - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (10)

    वेद, पुराण, आगम और स्मृतियाँ, इन सभी का परम सार प्रेम ही है। प्रेम के बिना हृदय में दिव्य प्रेम का बीज अंकुरित नहीं होता, अर्थात् दिव्य प्रेम की प्राप्ति अंततः प्रेम के द्वारा ही होती है।

  9. अँग अँग माहीं जव लगै - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (238.3)

    जब श्रीधाम वृंदावन की परम-पावन रज मेरे अंग-अंग को स्पर्श करती है और नेत्रों से निष्काम प्रेम के अश्रु बहने लगते हैं, तभी इस जीवन में सच्चे सुख और परम शांति की अनुभूति होती है।

  10. सहज स्वाँस तीरथ बहै सहजो - श्री सहजो बाई

    सहजोबाई जी कहती हैं कि श्रीहरि मनुष्य के भीतर ही विराजमान हैं और प्रत्येक सहज श्वास में उस परम तत्त्व की पावन धारा प्रवाहित हो रही है। जो साधक अंतर्मुख होकर इस सहज तीर्थ में स्नान करता है, अर्थात् अपने भीतर विराजमान श्रीहरि में निमग्न हो जाता है, उसके पाप-पुण्य दोनों समाप्त हो जाते हैं और वह श्रीहरि के परम पद को प्राप्त हो जाता है।

  11. मन तन दृग राधा गहे - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (13)

    श्रीराधा ने मेरे मन, शरीर और नेत्रों को पूरी तरह से अपने वश में कर लिया है, जिसके कारण अब मुझे किसी अन्य वस्तु या परिस्थिति की कोई सुधि नहीं रही है। हृदय में विरह का ऐसा तीव्र कोलाहल और व्याकुलता मची हुई है कि मन में जो कुछ भी उमड़ता है, मैं उन्मादवश वही बकने लगता हूँ।

  12. जगत भगत सबहीं हँसो बुरौ - श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (44)

    चाहे संसारी लोग हों या भक्तजन, सभी मिलकर मेरी हँसी उड़ाएँ, मैं किसी की बात का तनिक भी बुरा नहीं मानूँगा। श्रीराधा के प्राणप्रिय श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए अब जीवन में जो भी होनी हो, वह भले ही हो जाए।

  13. व्यास विझूका खेतकौ दुःख न काहू देइ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (146)

    श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि जैसे खेत में खड़ा बिजूका (पुतला) देखने में भय उत्पन्न करता है, पर वास्तव में वह किसी को कोई हानि नहीं पहुँचा सकता, वैसे ही संसार के भय और बाधाएँ भी केवल भयभीत करती हैं। जो साधक प्रभु पर भरोसा रखकर, सब प्रकार की भय-बाधायों से निःशंक होकर आगे बढ़ता है, वह भक्ति और प्रेम-रस की अपार संपदा प्राप्त करता है।

  14. पुरुष भाव धीरि लाल पै त्रिया भाव करि प्रिय - श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (13)

    प्रियतम लाल (श्रीकृष्ण) में ही एकमात्र पुरुष भाव को रखकर तथा स्वयं में उनके प्रति 'त्रिया भाव' (सखी या गोपी भाव) धारण करके, युगल सरकार के पारस्परिक लाड़-विहार और उनके 'तत्सुख' (केवल उनके सुख के लिए) की प्राप्ति हेतु युगल प्रेम में सर्वथा निष्ठावान और स्थिर होना चाहिए।

  15. आह्लादिनीत्वात् राधैव रसं - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (8)

    भगवान और भक्त दोनों को आनन्द प्रदान करने वाली आह्लादिनी होने के कारण, श्रीराधा ही सदा रस की वृद्धि करती हैं। मत्स्य एवं कच्छप आदि अवतारों के समय में रस की वार्ता भी दुर्लभ थी।

  16. राधा के दृग खेल में - श्री मतिराम, मतिराम ग्रंथावली, ललितलाम (216)

    खेल-खेल में श्रीकृष्ण ने श्रीराधा के नेत्रों को बंद कर लिया, और फिर श्री राधा अपने नेत्रों की कोरों से ऐसे तिरछे कटाक्ष करने लगीं कि उनकी वह सम्मोहक चितवन श्रीकृष्ण के हृदय के आर-पार हो गई।

  17. जीवन तुम बिनु व्यर्थ है - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (12)

    हे परम चतुर और सुजान प्रियतम! आपके बिना मेरा यह जीवन पूरी तरह से व्यर्थ है। विरह के कष्टदायक संताप से निरंतर तड़प-तड़पकर प्राणों के जलने से तो यही बेहतर है कि मुझे मृत्यु मिल जाए।

  18. तेरह लाख सँडीले उपजे सब - श्री सूरदास मदनमोहन (गौड़ीय संत)

    सूरदास मदनमोहन जी कहते हैं कि संडीला में प्राप्त तेरह लाख रुपये साधु-संतों की सेवा एवं भंडारे में समर्पित कर, वे स्वयं सब कुछ त्यागकर वृंदावन की ओर प्रस्थान कर गए। कहा जाता है कि वे अकबर के समय संडीला के राजस्व अधिकारी थे और शाही खजाने में भेजे गए संदूकों में कंकड़-पत्थर भरकर उनके भीतर यह दोहा लिख कर भिजवा दिया था। जब यह बात बादशाह अकबर तक पहुँची तो उन्होंने सूरदास मदनमोहन जी की निष्कपटता को देखते हुए उनको क्षमा कर उन्हें पुनः बुलाया, किंतु सूरदास जी राजकीय सेवा से विरक्त होकर श्रीवृन्दावन में ही रहने लगे थे।

  19. सोवत जागत हरि भजो हरि - श्री दयाबाई

    सोते और जागते हुए निरंतर श्री हरि का भजन करो, उन्हें अपने हृदय से कभी विस्मृत मत होने दो। श्री दयाबाई जी कहती हैं कि हरि-नाम की डोरी को ऐसे थामे रहो कि प्रभु-स्मरण का यह तार कभी टूटने न पाए।

  20. राधा मंगल-मालती सरस मधुब्रत - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (90)

    परम-हितकारी श्रीराधा मालती के फूल के समान हैं, जिनके रस का पान करने के लिए श्यामसुन्दर भ्रमर के सामान सदा मंडराते रहते हैं। श्री धाम वृन्दावन में यमुना के तट पर सदा सुशोभित रहने वाली यह युगल जोड़ी रसिकों का जीवन-प्राण है।