वने वनचरी पातु वृन्दावनविनोदिनी - नारद पंचरात्र (2.5.34)
वनों में विहार करने वाली, श्री वृंदावन विनोदिनी श्री राधा मेरी वन में रक्षा करें। वे सर्वेश्वरी, विरजेश्वरी, पराशक्ति स्वामिनी, सर्वत्र, सदा मेरी रक्षा करें।
नारद पंचरात्र वैष्णव संस्कृत के प्राचीनतम ग्रंथों में से एक है जिसमें विशेषकर श्री राधा कृष्ण की भक्ति का वर्णन मिलता है । इसमें साठ अध्याय हैं जिन्हें पाँच खण्डों में विभक्त हैं।
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वनों में विहार करने वाली, श्री वृंदावन विनोदिनी श्री राधा मेरी वन में रक्षा करें। वे सर्वेश्वरी, विरजेश्वरी, पराशक्ति स्वामिनी, सर्वत्र, सदा मेरी रक्षा करें।
जैसे वानरों में हनुमान् और पक्षियों में गरुड सर्वश्रेष्ठ हैं, वैसे ही श्रीकृष्ण से प्रेम करने वाली समस्त सौभाग्यवती स्त्रियों में श्री राधा ही श्रेष्ठ हैं।
श्री राधिका का आख्यान अत्यंत अद्भुत एवं दुर्लभ है क्योंकि वेदों, पुराणों, इतिहासों एवं वेदांगों में यह परम् गोपनीय है।
जैसे ब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्ण प्रकृति से परे हैं, उसी प्रकार राधा भी ब्रह्मस्वरूपिणी, निर्लिप्ता तथा प्रकृति से परे हैं ।
श्री महादेव जी कहते हैं: यह राधिकाख्यान अपूर्व, गोपनीय, अत्यन्त दुर्लभ, तत्काल मुक्तिदायक, शुद्ध, वेदसार, तथा सुपुण्यप्रद है ।
‘रा' शब्द के उच्चारण से भक्त को (अत्यन्त दुर्लभा) भक्ति की प्राप्ति होती है जिससे सांसारिक बंधन से स्वतः ही मुक्ति की प्राप्ति भी हो जाती है तथा 'धा' शब्द के उच्चारण से वह हरि पद की ओर शीघ्र गमन करता है अर्थात् भगवान् के चरणों की दास्यरति प्राप्त करता है ।
श्री अयोध्या धर्मस्थान, श्रीरंग क्षेत्र मुक्ति साधन, श्री द्वारिका भक्ति स्थान तथा श्रीमथुरा (ब्रज क्षेत्र) रसस्थान हैं ।
अत्यधिक काल तक श्री कृष्ण की आराधना करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल श्री राधा की आराधना करने से स्वल्प (बहुत कम समय) में प्राप्त हो जाता है।
भगवान शिव कहते हैं कि मधुसूदन (श्री कृष्ण) श्री राधा द्वारा चर्वित ताम्बूल भी खाते हैं । वे दोनों एक ही हैं, श्री राधा और श्री कृष्ण में उसी प्रकार कोई भेद नहीं है जिस प्रकार दूध और उसकी धवलता अविभेद्य है ।
शिवजी पार्वती माता से कहते हैं कि इस ब्रह्मांड की माता तो श्री राधिका हैं और पिता श्याम सुन्दर श्री कृष्णचन्द्र हैं परन्तु पिता से माता श्रीराधिका जी सौगुनी वन्दनीय, पूजनीय तथा अत्यन्त श्रेष्ठ हैं ।
यदि कोई दैवदोष (पूर्वकमों) से कोई श्री राधिका की निन्दा करता है तो वह वाममार्गी, मूर्ख, पापी तथा साक्षात श्री हरि का द्वेषी है।
संत जन श्री राधा की नित्य भक्ति करते हैं जो तीनों लोकों के जीवों का उद्धार करती हैं । श्री कृष्ण भी हर क्षण श्रीराधा के चरण कमलों में भक्ति के साथ अर्चना करते हैं।
श्री वृंदावन वह दिव्य धाम है जहां श्री राधा माधव नित्य ही अंतरंग केलि में निमग्न रहते हैं।
जो श्रीकृष्ण हैं, वही श्रीराधा हैं और जो श्री राधा हैं, वही श्रीकृष्ण हैं, राधा-माधव के रूप में एक ही ज्योति दो प्रकार से प्रकट है।