नारद पंचरात्र

नारद पंचरात्र वैष्णव संस्कृत के प्राचीनतम ग्रंथों में से एक है जिसमें विशेषकर श्री राधा कृष्ण की भक्ति का वर्णन मिलता है । इसमें साठ अध्याय हैं जिन्हें पाँच खण्डों में विभक्त हैं।

14 लेख उपलब्ध हैं

  1. वने वनचरी पातु वृन्दावनविनोदिनी - नारद पंचरात्र (2.5.34)

    वनों में विहार करने वाली, श्री वृंदावन विनोदिनी श्री राधा मेरी वन में रक्षा करें। वे सर्वेश्वरी, विरजेश्वरी, पराशक्ति स्वामिनी, सर्वत्र, सदा मेरी रक्षा करें।

  2. सौभाग्यासु सुन्दरीषु राधा कृष्णप्रियासु च - नारद पंचरात्र (1.1.75)

    जैसे वानरों में हनुमान् और पक्षियों में गरुड सर्वश्रेष्ठ हैं, वैसे ही श्रीकृष्ण से प्रेम करने वाली समस्त सौभाग्यवती स्त्रियों में श्री राधा ही श्रेष्ठ हैं।

  3. राशब्दोच्चारणाद् भक्तो भक्तिं मुक्तिं च राति सः - नारद पाञ्चरात्र (2.3.38)

    ‘रा' शब्द के उच्चारण से भक्त को (अत्यन्त दुर्लभा) भक्ति की प्राप्ति होती है जिससे सांसारिक बंधन से स्वतः ही मुक्ति की प्राप्ति भी हो जाती है तथा 'धा' शब्द के उच्चारण से वह हरि पद की ओर शीघ्र गमन करता है अर्थात् भगवान् के चरणों की दास्यरति प्राप्त करता है ।

  4. घर्म स्थानं त्वयोध्याख्यं - वृहद्‌ ब्रह्म संहिता (नारद पंचरात्र के अन्तर्गत)

    श्री अयोध्या धर्मस्थान, श्रीरंग क्षेत्र मुक्ति साधन, श्री द्वारिका भक्ति स्थान तथा श्रीमथुरा (ब्रज क्षेत्र) रसस्थान हैं ।

  5. राधा-चर्वित-तांबुलं चखाद मधुसूदनः - नारद पंचरात्र (2.6.13)

    भगवान शिव कहते हैं कि मधुसूदन (श्री कृष्ण) श्री राधा द्वारा चर्वित ताम्बूल भी खाते हैं । वे दोनों एक ही हैं, श्री राधा और श्री कृष्ण में उसी प्रकार कोई भेद नहीं है जिस प्रकार दूध और उसकी धवलता अविभेद्य है ।

  6. श्रीकृष्णो जगतां तातो जगन्माताच राधिका - नारद पंचरात्र (2.6.7)

    शिवजी पार्वती माता से कहते हैं कि इस ब्रह्मांड की माता तो श्री राधिका हैं और पिता श्याम सुन्दर श्री कृष्णचन्द्र हैं परन्तु पिता से माता श्रीराधिका जी सौगुनी वन्दनीय, पूजनीय तथा अत्यन्त श्रेष्ठ हैं ।

  7. त्रैलोक्यपावनीं राधां सन्तो सेवन्त नित्यश - नारद पंचरात्र (2.6.11)

    संत जन श्री राधा की नित्य भक्ति करते हैं जो तीनों लोकों के जीवों का उद्धार करती हैं । श्री कृष्ण भी हर क्षण श्रीराधा के चरण कमलों में भक्ति के साथ अर्चना करते हैं।