कौन सुने अब बात हमारी - श्री सूरदास, सूरसागर
हे बनवारी! अब भला मेरी बात कौन सुनेगा? मुझे आपके समान कोई दूसरा सामर्थ्यवान दिखाई नहीं देता, फिर मैं अपनी अंतःकरण की पीड़ा और किससे जाकर कहूँ?
सूरसागर, श्री सूरदास द्वारा लिखित दोहों का संकलन है।
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हे बनवारी! अब भला मेरी बात कौन सुनेगा? मुझे आपके समान कोई दूसरा सामर्थ्यवान दिखाई नहीं देता, फिर मैं अपनी अंतःकरण की पीड़ा और किससे जाकर कहूँ?
श्री वृन्दावन की सघन कुंजों में रसमयी, सुगंधित और मंद-शीतल मलय पवन बहती है। श्री धाम वृंदावन में जो अलौकिक प्रेम-क्रीड़ा होती है, वैसी विहार लीला तीनों लोकों में कहीं भी नहीं है।
हे प्रभु! मैंने अब आपका पीछा पकड़ लिया है, अर्थात् अब मैं आपकी अनन्य शरण में आ गया हूँ। आप तो दीनों पर दया करने वाले कहे जाते हैं, अतः मेरी समस्त विपत्तियों को टाल दीजिए।
जब परम स्नेही नन्दनन्दन श्रीकृष्ण ने अत्यधिक प्रेम के साथ अपनी प्यारी श्रीराधा के चरणों का स्पर्श किया, तब प्रियाजी का मान (रूठना) समाप्त हो गया और वे प्रसन्न हो उठीं, जिससे विरह का सारा दुःख और द्वंद्व पूरी तरह मिट गया।
श्री हरि के मुख से निरंतर केवल 'राधा-राधा' का ही नाम निकल रहा है। वे सुध-बुध खोकर अचेत अवस्था में पृथ्वी पर पड़े हुए हैं, उनकी ऐसी दशा देखकर सखियाँ अत्यंत व्याकुल हो उठी हैं।
उद्धव द्वारा प्रतिपादित योग के प्रत्युत्तर में ब्रज-गोपिकाएँ प्रेम-तत्व की सर्वोच्चता सिद्ध करते हुए कहती हैं— प्रेम का सच्चा निश्चय ही जीवन की सरस मुक्ति है और जब जीवन में श्री गोपाल के प्रति प्रेम दृढ़ हो जाता है, तो वे अवश्य मिल जाते हैं।
ब्रह्मा कहते हैं— ब्रज की गलियों में बसने की रीति ऐसी ही होनी चाहिए जहाँ हम ब्रजवासियों और ग्वालों के जूठे पत्तलों से अन्न के दानों (सीथ) को चुन-चुनकर अपना पेट भरें।
जब उद्धव योग की युक्ति-विधि की चर्चा करते हैं, तब ब्रज की गोपियाँ उत्तर देती हैं— हम तो सीधी-सादी ग्वालिनें हैं, हम योग साधने की क्रिया कैसे समझेंगी? तुम ही बताओ श्री कृष्ण के निष्काम प्रेम के एकमात्र व्रत को छोड़ कर कौन दीवार पर बने चित्र या अंकित चिह्न/अक्षर आदि की पूजा करेगा?
ब्रह्मा जी विनयपूर्वक स्तुति करते हुए कहते हैं—“हे माधव! मुझे श्री वृन्दावन की पावन रज बना दीजिए। यह वही दिव्य धूल है, जिस पर आप अपने चरणों से विचरण करते हैं और प्रतिदिन वन-वन जाकर गौओं को चराते हैं।”
जैसे-जैसे तेरे प्रियजन, कुटुम्ब और परिवार का विस्तार होता गया, और पुत्र, पत्नी, धन तथा वैभव बढ़ते गए, वैसे-वैसे तू विषयासक्त होकर भ्रमित होता गया। सांसारिक इच्छाओं और कामनाओं ने तेरे चित्त को इस प्रकार बांध लिया कि तू अपने जीवन के वास्तविक लक्ष्य को ही भूल बैठा। अरे मूर्ख! क्या इसी को तू अपनी विजय समझ बैठा है? स्मरण कर—तेरा जन्म केवल भगवद्प्राप्ति और आत्मोद्धार के लिए हुआ था।
वृंदावन में भगवान हरि (श्रीकृष्ण) होली खेल रहे हैं। वहाँ ताल, मृदंग, झाँझ और डफ बज रहे हैं, और नंदलाल (कृष्ण) व वृषभानुकिशोरी (राधा मिलकर उत्सव मना रहे हैं।
संसार के समस्त रसों में प्रेम-रस ही सर्वोत्तम है। जैसे एक विषयी जुआरी सार (जुए की गोटियाँ) खेलते समय तन, मन, धन और यौवन अर्थात् सब कुछ दाँव पर लगा देता है। वह सब कुछ नष्ट कर बैठता है, फिर भी हार स्वीकार नहीं करता, क्योंकि उसका चित्त पूरी तरह उसी खेल में आसक्त हो जाता है। उसी प्रकार प्रेम-रस में प्रविष्ट व्यक्ति भी अपने सर्वस्व को अर्पित कर देता है और किसी भी दशा में पीछे नहीं हटता ।
श्री राधिका और श्यामसुंदर दोनों सुशोभित हैं। ब्रजवनिताओं का सम्पूर्ण समूह भी उनके साथ ही सुशोभित है। आकाश से देवांगनाएँ भी उत्सुक होकर उनके दर्शन कर रही हैं।
प्रिय के असीम प्रेम को सुनकर चातक पक्षी सदा बादलों की ओर अनन्य भाव से निहारता है। उसी मेघ की आशा से सब दुख सहता है, परंतु मरते दम तक भी जल (वर्षा) के लिए यांचना नहीं करता। सच्चे प्रेमी का यही स्वभाव होता है कि वह अपने प्रियतम से कुछ भी माँगता नहीं।
हे भगवान् श्री हरि! आपका भजन किया ही नहीं जाता, क्या करूँ? आपकी प्रबल माया मेरे मन को बार-बार भ्रमित कर देती है।
ब्रह्मा जी, श्रीकृष्ण से क्षमा याचना करते हुए कहते हैं — "हे प्रभु! आप ब्रज में गायें चराते रहते हो और नन्दबाबा की शपथ की दुहाई देते हो। आपकी इन अलौकिक लीलाओं को जब सहस्र (हज़ार) मुख वाले शेषनाग नहीं जान सके, तो फिर मैं चार मुख वाला ब्रह्मा कैसे गुणगान कर सकता हूँ?"
अरे मन! श्यामसुन्दर से प्रेम के बंधन में जुड़ जा । “कृष्ण” नाम का घेरा अपने चारों ओर बना ले, और अपना जीवन रूपी खेत सुरक्षित कर ले ।
श्रीधाम वृन्दावन और सम्पूर्ण व्रजभूमि का ऐसा अपार महत्व है कि उसका वर्णन वाणी और बुद्धि की सीमाओं से परे है। जब स्वयं चार मुख वाले ब्रह्मा जी ने ब्रज में अपने अपराध को स्वीकारते हुए श्रद्धा से श्रीकृष्ण के चरणों का स्पर्श किया, तब वे अपने ब्रह्मलोक लौटकर अनन्त सुख को प्राप्त हुए।
ब्रजवासियों की बराबरी कोई नहीं कर सकता। जिन श्रीकृष्ण को ब्रह्मा, शिव, सनकादि आदि भी ध्यान में नहीं पा सकते, वही श्रीकृष्ण प्रेमवश ब्रजवासियों की जूठी थाली से अन्न ग्रहण करते हैं।
सभी वेद, पुराण और स्मृतियाँ उसी प्रभु की महिमा का बखान करते हैं, जिसकी सेवा सभी सुर-नर-मुनि आदि करते हैं। अरे महामूर्ख मन! तू उस परम प्रभु का स्मरण क्यों नहीं करता?